Gupta Dynasty in Hindi-गुप्त साम्राज्य सम्पूर्ण जानकारी

गुप्त साम्राज्य (Gupta Dynasty in Hindi)

Who founded the Gupta?

गुप्तों की उत्पत्ति (Where did the Gupta Empire originated?)

  • गुप्त कौन थे ? यह प्रश्न अभी भी विवादास्पद बना हुआ है|
  • गुप्त सम्राटों को काशी प्रसाद जायसवाल ‘ जाट ‘ और मूलतः पंजाब का निवासी मानते हैं ।
  • राय चौधरी के अनुसार गुप्त ‘ ब्राह्मण थे । गौरीशंकर ओझा गुप्तों को ‘ क्षत्रिय ‘ स्वीकार करते हैं ।
  • एलन और अल्तेकर गुप्तों को ‘ वैश्य ‘ मानते है
  • अधिकांश विद्वानों की गुप्तों के वैश्य होने सहमति है
  • गुप्त मूलतः पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार से संबंधित है क्योंकि इनके आरंभिक सिक्के इसी क्षेत्र से मिले हैं| अनेक इतिहासकार गुप्तों का मूलनिवास कौशाम्बी ( इलाहाबाद के समीप ) स्थल को माना है |
  • गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त ‘ ( 240-280 CE ) को माना जाता है । श्रीगुप्त का कोई भी लेख अथवा सिक्का नहीं मिलता ।
  • श्रीगुप्त के बाद उसका पुत्र घटोत्कच गुप्त शासक हुआ । प्रभावती गुप्त के तापपत्र लेखों में इसे गुप्त वंश का प्रथम शासक बताया गया है ।Gupta Dynasty

Ruler Of Gupta Dynasty

चन्द्रगुप्त प्रथम ( 319-335 0 )

  • घटोत्कच का पुत्र तथा गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक , चन्द्रगुप्त ने ही सबसे पहले ‘ महाराजाधिराज ‘ की सम्राटपरक उपाधि धारण की । इसने पाटलिपुत्र को अपने राजधानी बनाया
  • महान बिम्बिसार की भांति इसने भी लिच्छति राजकुमारी कुमार देवी से वैवाहिक संबंध बनाकर अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाया , यह संबंध गुप्त साम्राज्य के इतिहास में विशेष महत्व रखता है
  • चन्द्रगुप्त ने 319-20 ई ० में एक ‘ गुप्त संवत चलाया ।
  • चंद्रगुप्त प्रथम ने सोने के सिक्के जारी किए, कुछ सिक्कों पर उसकी पत्नी कुमार देवी का भी चित्र है

समुद्रगुप्त ( 335-75 0 )

  • जानकारी के स्रोत– हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति, मध्य प्रदेश सागर स्थित एरण अभिलेख, सिक्के – गरुड़ प्रकार, अश्वमेध प्रकार, व्याघ्र हनन प्रकार, वीणा वादन प्रकार ,धनुर्धारी प्रकार परशु  प्रकार |
  • चन्द्रगुप्त प्रथम का पुत्र समुद्रगुप्त या । इसे पृथु राघव ( एरण अभित्तेख ) आदि राजाओं से बढ़कर  दानी कहा गया है ।
  • “पराक्रमांक, लिच्छवि दौहित्र ” सर्वराजोच्छेता “, कृतान्तु परशु जैसी उपाधियाँ समुद्रगुप्त ने धारण की ।
  • समुद्रगुप्त के कुछ सिक्कों पर ‘ काच ‘ नाम उत्कीर्ण है जिसे इतिहासकार स्मिथ , पलीट सगुद्रगुप्त का ही दूसरा नाम मानते है ।
  • समुद्रगुप्त का आदर्श , प्राचीन क्षत्रियों का आदर्श , दिग्विजय और भारत का राजनीतिक एकीकरण था । .
  • इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि ‘ दिग्विजय ‘ है इसके बारे में हरिषेण द्वारा रचित ‘ प्रयाग प्रशस्ति लेख ‘ ( चम्पूशैली से विस्तृत जानकारी मिलती है ।
  • आर्यावर्त या उत्तर भारत पर समुद्रगुप्त ने दो बार आक्रमण किया । आर्यावर्त के कुल 9 राज्यों की विजय को ‘ आर्यावर्तराज्यसभोवार या प्रसभोद्धरण (बलात उन्मूलन कर साम्राज्य में विलय करना) कहा गया है|
  • समुद्रगुप्त ने आटविकों को पराजित किया । संभवतः मथुरा से नर्मदा तक के प्रदेशों निवासी थे ।
प्रयाग प्रशस्ति लेख

●        वह लेख गद्य – पद्य मिश्रित चम्पूकाव्य है जो विशुद्ध रूप से प्रशस्ति है । इसे इलाहाबाद स्तम्भ लेख भी कहा जाता है । इसमें गुप्त के दिग्विजय सहित उसके चरित्र विशद वर्णन है । 35 फिट ऊँचे पत्थर के गोल स्तम्भ पर अंकित यह प्रशस्ति लेख  वर्तमान में इलाहाबाद के किले में स्थित है| यह लेख मूलतः कौशाम्बी में स्थापित था जिसे अकबर के शासन काल में इलाहाबाद लाया गया |

●        अभिलेख के ऊपरी भाग में सम्राट अशोक  एक लेख अंकित है जिसे उसने कौशाम्बी में अकित कराया था । अशोक के लेख के बाद इसमें समुद्रगुप्त के संधिविग्रहक हरिषेण द्वारा विरचित समुद्रगुप्त के प्रशस्ति लेख है । इस पर जहाँगीर का भी एक लेख अंकित है ।

 

  • दक्षिणापथ की विजय प्रथम आर्यावर्त अभियान के बाद किया गया , जिसमें 12 राज्यों का समुद्रगुप्त से सामना हुआ ।
  • समुद्रगुप्त की दक्षिण विजय की तीन आधार शिलायें थी- ” ग्रहण ” शत्रु पर अधिकार , ” मोक्ष शत्रु को मुक्त करना और ” अनुग्रह ” राज्य लौटाकर शत्रु पर दया करना ।
  • विदेशी राज्यों में देवपुत्रशाहिशाहानुशाहि और मुरुण्ड को परास्त किया ।
  • समुद्रगुप्त की अधीनता सिंहल के राजाओं स्वीकार की थी ।
  • चीनी श्रोत के अनुसार समुद्रगुप्त ने सिंहलद्वीप के राजा  मेघवर्ण को बोधगया में संघाराम बनवाने  की आज्ञा दी ।
  • सीमावर्ती राज्यों ( प्रत्यंत राज्यों ) से समुद्रगुप्त ने ” सर्वकरदान ” आज्ञा करण ‘ और ‘ प्रणामागमन ‘ नीति अपनायी । उत्तरी तथा पूर्वी सीमा पर स्थित इन राज्यों की संख्या 5 थी ।
  • कभी भी पराजय का सामना न करने के कारण समुद्रगुप्त की तुलना नेपोलियन से की जाती है । विसेंट स्मिथ महोदय ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन ‘ कहा ।
  • समुद्रगुप्त विजेता होने के साथ ही कवि , संगीतज्ञ और विद्याप्रेमी भी था ।
  • समुद्रगुप्त ने कविराज की उपाधि धारण की इसे ‘ कृष्णाचरितम् ‘ पुस्तक का लेखक माना जाता है । वह वीणा प्रेमी भी था । सिक्कों पर उसे दीणा बजाते हुए दिखाया गया है ।
  • समुद्रगुप्त ने बौद्ध भिक्षु बसुबंधु को आश्रय प्रदान किया ।
  • अपनी दिग्विजय के बाद समुद्राज ने अश्वमेध यज्ञ किया ।
  • समुद्र गुप के अश्वमेध प्रकार के सिक्कों के मुख भाग पर यज्ञ में बंधे हुए घोड़े का वित तथा पृष्ठ भाग पर राजमहिती दत्तदेवी का चित्र अंकित है ।
  • Gupta Dynasty in Hindi
  • Gupta Dynasty in Hindi
●       समुद्रगुप्त द्वारा विजित राज्य इस प्रकार हैं –

●        आयविर्त के शासक -1 ) रुद्रदेव ( संभवतः नागदत्त , ( 2 ) मत्तिल ( बुलंदशहर ) , ( 3 नाग्द्त्त   ( 4 ) चन्द्रवर्मा ( पुष्करण मारवाड़ शाम्बी ) .5. गणपतिनाग ( विदिशा ) , ( 6 ) नागसेन ( पदमावती ग्वालियर ) , ( 7 ) अच्युत ( अहिच्छत्र क्षिण के शासक  ( 8 ) नंदि , ( 9 ) बलवर्मा ।

●        दक्षिण के शासक –( 1 ) कोशल का महेन्द्र महाकोसल ) ( 2 ) महाकान्तार का व्याघ्रराज 3.कौशल का मंटराज , ( 4 ) पिष्टपुर , महेन्द्रगिरि 5 ) कोटटूर का शासक स्वामी दत्त , ( 6 एरण्डपल्ल का दमन . ( 7 ) काँची का विष्णुगोप ) 8.अवमुक्तक का नीलराज , ( 9 ) वेंगी का हस्तिवर्मा , ( 10 ) पालक्का का उग्रसेन , ( 11 ) देवराष्ट्र का कुबेर , ( 12 ) कुस्थलपुर का धनंजय ।

●        गणराज्य -1 ) मालवा . ( 2 ) यौधेय , ( 3 ) अर्जुनायन , ( 4 ) मद्रक , ( 5 ) आभीर , ( 6 ) प्रार्जुन , 7 ) सनकानीक , ( 8 ) काक , ( 9 ) खरपरिक ।

●        सीमावर्ती राज्य – 1.समतट , ( 2 ) डवाक , ( 3 ) कामरूप , ( 4 ) नेपाल , ( 5 ) कर्तृपुर ।

सफलता के 10 सूत्र:-

 चंद्रगुप्त द्वितीय ( 380-412 0 )

  • जानकारी के स्रोत – सांची अभिलेख, मथुरा अभिलेख, उदयगिरि के दो अभिलेख ,महरौली का चंद्र लेख| सिक्के- धनुर्धारी प्रकार ,छत्रधारी प्रकार, सिंह  नियंता प्रकार अश्वारोही प्रकार|  चंद्रगुप्त द्वितीय के स्वर्ण  सिक्कों को दिनार भी कहा गया है|
  • रामगुप्त को अपदस्थकर चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य अगला गुप्त शासक बना ।
  • राम गुप्त का गुप्त शासक के रूप में उल्लेख विशाखदत्त कृत ‘ देवीचंद्रगुप्तम ‘ नाटक में मिलता है ।
  • राम गुप्त का तांबे का सिक्का मिला है और उसका विवरण बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित पुस्तक में भी मिलता है|
    • सांची अभिलेख में इसे ‘ देवराज तथा वाकाटक लेखों में ‘ देवगुप्त ‘ कहा गया है ।
    • चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल को भारत में गुप्तयुग का ‘ स्वर्ण काल ‘ माना जाता है ।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय की प्रथम रानी कुवेरनाग थी इसी से प्रभावती का जन्म हुआ था , और दूसरी रानी ध्रुवस्वामिनी थी ।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने कुबेरनाग से विवाह कर नागों से मित्रता कर ली और अपनी पुत्री प्रभावती की शादी रुद्रसेन द्वितीय से करके दक्षिण के शक्तिशाली वाकाटकों से मित्रता कर ली ।
    • चन्द्रगुप्त द्वितीय को उसकी मुद्राओं में ‘ विक्रमादित्य ‘ , ‘ नरेशचन्द्र ‘ , ‘ नरेन्द्र सिंह ‘ , ‘ सिंह विक्रम ‘ तथा ‘ देवश्री ‘ आदि कहा गया है ।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय की सबसे महत्वपूर्ण घटना है अवंति के शक राजा रुद्रसेन तृतीय की पराजय ।
  • शकों के मद को चूर करने के कारण चन्द्रगुप्त द्वितीय को ‘ शकारि ‘ कहा गया । इसी समय चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ‘ साहसांक ‘ , ‘ शकारि ‘ और ‘ विक्रमादित्य ‘ की उपाधियाँ धारण की ।
  • शकों को पराजित करने की स्मृत्ति में चन्द्रगुप्त मालवा क्षेत्र में व्याघशैली के चांदी के सिक्के चलाये ।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने उज्जैन को गुप्त साम्राज्य की दूसरी राजधानी बनाया ।
    • बल्ख विजय के स्मरण में पंजाब में व्यास नदी पर स्थित विष्णुपद पर चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विष्णुध्वज
  • (लौहस्तम्भ) की स्थापना की थी ।
    • लौहस्तम्भ ( विष्णु – ध्वज ) को बाद में फिरोजशाह ने दिल्ली के मेहरौली में कुतुबमीनार के समीप स्थापित कराया था ।
    • इस स्तम्भ पर उत्कीर्ण लेख में राजा चन्द्र द्वारा सप्तसिंधु पार कर बहलीकों के विरुद्ध और पूर्व बंग शासकों के विरुद्ध विजय का वर्णन है ।
  • चाँदी के सिक्के सर्वप्रथम चंद्रगुप्त द्वितीय के ही मिलते हैं । इसके द्वारा चलाये गये स्वर्ण सिक्के ( दीनार ) तौल में 121 ग्रेन से 132 ग्रेन तक थे ।
    • चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में संस्कृत साहित्य के नौ रत्नों को संरक्षण मिला था जो इस प्रकार थे – कालिदास , धन्वन्तरि , क्षपणक , अमर सिंह ,शंकु , वैताल भट्ट , घटकर्पर , वाराहमिहिर , वररुचि ।
  • धन्वन्तरि चंद्रगुप्त के दरबार का प्रसिद्ध चिकित्सक था, इसे ‘ भारतीय आयुर्वेद का पिता ‘ कह जाता है ।
  • महाकवि कालिदास चन्द्रगुप्त के दरबार का प्रसिद्ध कवि था । इसे ‘ भारत का शेक्सपीयर ‘ कहा जाता है । कुंतल नरेश के दरबार में कालिदास गुप्त सपाट के दूत के रूप में गया था ।
    • वाराहमिहिर ने खगोलशास्त्र पर वृहत्संहिता की रचना की ।
    • चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय प्रसिद्ध चीनी बौद्ध फाहियान ( 399-414ई ० ) भारत आया ।
    • फाहियान ने बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन तथा प्रमुख  स्थानों को देखने की लालसा में भारत की यात्रा की थी । इसने यात्रा के दौरान प्राप्त आपने  अनुभवों को ‘ फु – को – की ‘ ( बौद्ध राज्यों विरण ) नामक ग्रंथ में संकलित किया ।
    • फाहियान के बचपन का नाम कुङ था , इसने प्रदेश का व्यापक भ्रमण किया और लिखा कि यहां के लोग क्रय – विक्रय हेतु कौड़ियों का प्रयोग करतें थे|
    • Gupta Dynasty in Hindi

कुमार गुप्त प्रथम ( 412-50 )

  • उपाधि – महेन्द्रादित्य , श्री महेंद्र , अश्वमेध महेंद्र
  • कुमारगुप्त चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद शासक हुआ|
  • कुमारगुप्त ने एक अश्वमेध यज्ञ कराया था । कुमारगुप्त द्वारा कोई नई विजय नहीं की गयी थी ।
  • कुमारगुप्त ने नालंदा बौद्ध विहार की स्थापना की । नालंदा को ‘अक्सफोर्ड ऑफ महायान बौद्ध ‘ कहा गया |
  • गुप्त शासक कुमार गुप्त द्वारा सर्वाधिक अभिलेख (लगभग 18)तथा सर्वाधिक सिक्के (14) प्रकार के जारी करवाये गये|
  • इस समय गुप्तकालीन मुद्राओं का सबसे बड़ा ढेर ( 623 मुद्राएं) बयाना ( भरतपुर राजस्थान ) से मिला है|
  • कुमार गुप्त द्वारा जारी 14 प्रकार के सिक्कों में सर्वाधिक मयूर शैली के हैं ।
  • दमोदरपुर ( दीनाजपुर ) के प्रथम एवं द्वितीय दानपत्र , धनुदैत्य एवं वैग्राम के दानपात्र से  बंगाल की अधीनता का प्रमाण मिलता है
  • कुमारगुप्त प्रथम के समय सर्वप्रथम हूणों का आक्रमण हुआ| कुमारगुप्त के पुत्र स्कंद गुप्त ने हूणों को पराजित  किया था |
  • कुमारगुप्त के प्रमुख अभिलेख इस प्रकार हैं
  • तुम्मन या तुममैन अभिलेख ( ग्वालियर ) में कुमारगुप्त को शरदकालीन सूर्य की भांति बताया गया है ।
  • साँची अभिलेख में हरिस्वामिनी द्वारा साँची के आर्य संघ को दान देने का उल्लेख है ।
  • उदयगिरि गुहालेख जैन अभिलेख है जिसमें शंकर नामक व्यक्ति द्वारा पार्श्वनाथ की मूर्ति को स्थापित करने का उल्लेख है ।
  • मन्दसोर अभिलेख ( मालवा स्थित ) में रेशम बुनकरों की एक श्रेणी का उल्लेख मिलता है ।

स्कन्दगुप्त ( 450-67 )

  • कुमार गुप्त महेन्द्रादित्य के बाद स्कंद गुप्त सिंहासन पर बैठा|
  • स्कन्दगुप्त के समय हूणों का आक्रमण हुआ , जूनागढ़ अभिलेख में हूणों को ‘ म्लेच्छ ‘ कहा गया|
  • जूनागढ़ ( सौराष्ट्र ) अभिलेख स्कन्दगुप्त का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख है । इसमें उसके पुरपति चक्रपालित द्वारा सुदर्शन झील के बाँध के पुनर्निर्माण का विवरण है ।
  • कहौम स्तम्भलेख ( गोरखपुर ) में भद्रजन नामक व्यक्ति के द्वारा पाँच जैन तीर्थकारों की प्रतिमाओं का विवरण है।
  • स्कंदगुप्त कहोम अभिलेख में ‘ शक्रादित्य , ‘ आर्थमंजूश्री मूलकल्प ‘ में ‘ देवराय ‘ तथा जूनागढ़ अभिलेख में ‘ श्रीपरीक्षितवक्षा ‘ कहा गया है ।
  • भितरीस्तम्भ लेख जो उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में स्थित है में पुष्यमित्रों और हूणों के साथ स्कन्दगुप्त के युद्ध का वर्णन है ।
  • स्कंदगुप्त द्वारा नालंदा संघाराम के लिए दान देने का उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है ।
  • स्कंदगुप्त के चीन के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध का उल्लेख मिलता है , 466 ई0 के लगभग चीनी सांग सम्राट के दरबार में स्कंदगुप्त द्वारा दूत भेजने का उल्लेख मिलता है ।
  • स्कंदगुप्त के बाद गुप्त साम्राज्य पर भिन्न भिन्न परंपरा के गुप्त शासक हुए जिसमें एक वंश स्कन्दगुप्त के भ्राता पुरुगुप्त का था और दूसरा वंश बुधगुप्त का था ।
  • स्कन्दगुप्त के बाद ‘ पुरुगुप्त प्रकाशादित्य ‘ शासक हुआ , यह 467-73 ई 0 तक शासन किया ।
  • बुध गुप्त ने 476 ई 0 से 405 ई 0 तक , नरसिंह ने 495 ई 0 5100 तक शासन किया ।
  • मालवा क्षेत्र के शासक भानुगुप्त के समय के एरण अभिलेख ( 510 ई 0 ) से सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण मिलता है ।
  • अभिलेख के अनुसार भानुगुप्त का मित्र गोपराज हूणों के साथ हुए युद्ध में शहीद हो गया तथा उसकी पत्नी चिता पर पती के साथ सती हो गई ।
  • कुमारगुप्त द्वितीय के समय रेशम जुताहों की का जीर्णोद्वार करवाया था ।
  • अंतिम गुप्त शासक विष्णु गुप्त (एक अन्य सूची कुमारगुप्त तृतीय)
  • गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद गुप्त प्रांतों सबसे पहले जूनागढ़ प्रांत स्वतंत्र हुआ ।

गुप्तों के पतन के कारणों में हूणों का आक्रमणा एक प्रमुख कारण है । इसके अलावा अयोग्य उत्तराधिकारी , उच्च पदों का आनुवांशिक होना , शासन – व्यवस्था का संघात्मक स्वरुप आदि कारण थे ।

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